सम्पादकीय– दिनेश कुमार
भारतीय साहित्य के अमर काव्य रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने केवल भगवान राम की महिमा का ही वर्णन नहीं किया, बल्कि समाज के चरित्र, नैतिकता और मानवीय प्रवृत्तियों का भी गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है। विशेष रूप से उत्तरकांड में उन्होंने दुष्ट लोगों की प्रवृत्ति पर जो प्रकाश डाला है, वह आज के दौर में भी उतना ही सार्थक और सटीक प्रतीत होता है।
तुलसीदास जी लिखते हैं—
“पर हित सरिस धरम नहि भाई।
पर पीड़ा सम नहि अधमाई॥”
यह दोहा स्पष्ट करता है कि परोपकार से बढ़कर कोई धर्म नहीं और किसी को कष्ट देने से बड़ा कोई अधर्म नहीं। लेकिन आज का सामाजिक परिदृश्य देखें तो ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ और परनिंदा जैसी प्रवृत्तियाँ तेजी से बढ़ती दिखाई देती हैं।
दुष्ट प्रवृत्ति की पहचान
तुलसीदास जी के अनुसार दुष्ट व्यक्ति बिना कारण ही दूसरों का अहित करता है। उसे किसी की उन्नति सहन नहीं होती। वह सदैव अवसर की तलाश में रहता है कि किस प्रकार दूसरे को नीचा दिखाया जाए। ऐसे लोग समाज में भ्रम, कलह और तनाव का वातावरण बनाते हैं।
आज के डिजिटल युग में यह प्रवृत्ति सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, फेक न्यूज और चरित्र हनन के रूप में भी देखने को मिलती है। बिना सत्य जाने आरोप लगाना और किसी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना मानो एक सामान्य प्रवृत्ति बनती जा रही है।
संत और असंत का अंतर
तुलसीदास जी कहते हैं—
“बंदउँ संत असज्जन चरना।
दुखप्रद उभय बीच कछु बरना॥”
संत और दुष्ट दोनों समाज में उपस्थित रहते हैं। संत चंदन की तरह होते हैं, जो कटने पर भी सुगंध देते हैं, जबकि दुष्ट सर्प के समान होते हैं, जो बिना कारण भी डस लेते हैं।
यह तुलना हमें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है—हम किस श्रेणी में खड़े हैं?
वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिकता
आज जब भ्रष्टाचार, नैतिक पतन और व्यक्तिगत स्वार्थ की खबरें आए दिन सुर्खियाँ बनती हैं, तब तुलसीदास जी की वाणी हमें चेतावनी देती है कि समाज की वास्तविक उन्नति केवल कानून से नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण से होगी।
दुष्ट प्रवृत्ति केवल किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक वातावरण को प्रदूषित करने वाली मानसिकता है। इसका समाधान शिक्षा, संस्कार और आत्मसंयम में निहित है।
