कटनी। शहर में इन दिनों भक्तिभाव का नया केंद्र उभर कर सामने आया है—Rajshree Gutkha। फर्क बस इतना है कि यहां प्रसाद लेने से पहले जेब की आरती उतारी जा रही है।
जो पाउच कल तक 35–40 रुपए में मुस्कुराता हुआ मिल जाता था, वही अब 45 रुपए में शान से सीना ताने खड़ा है। 315 रुपए वाला पैकेट अब 420 रुपए में ‘विशेष संस्करण’ जैसा महसूस कराया जा रहा है। लगता है कंपनी ने नहीं, बल्कि बाजार ने ही इसे प्रीमियम प्रोडक्ट घोषित कर दिया है।
‘होल्ड एंड हाई रेट’—कटनी मॉडल
शहर के कुछ होनहार व्यापारियों ने अर्थशास्त्र की नई परिभाषा गढ़ी है—
“माल रोकिए, भाव भड़काइए, और मुनाफा घर लाइए।”
गोदामों में स्टॉक सुरक्षित है, बाजार में ‘कमी’ का माहौल है, और ग्राहक के चेहरे पर चिंता की लकीर है। खुदरा दुकानदार बेचारा काउंटर पर खड़ा समझा रहा है—“भैया, हमें भी महंगा मिल रहा है।”
और असली खिलाड़ी? वे परदे के पीछे से भाव की पिच पर चौके-छक्के लगा रहे हैं।
जमाखोरी का ‘संस्कार’ शिविर
कहा जा रहा है कि यह सब ‘कृत्रिम कमी’ का कमाल है। माल उपलब्ध होते हुए भी ऐसे गायब है जैसे परीक्षा के समय पढ़ाई।
दाम बढ़ते ही कालाबाजारी का नेटवर्क भी फिटनेस मोड में आ गया है—पूरी चुस्ती-फुर्ती के साथ।
प्रशासनिक जागरण कब?
कटनी की जनता अब पूछ रही है—
क्या स्टॉक की जांच होगी?
क्या गोदामों पर दस्तक दी जाएगी?
क्या फूड विभाग, आबकारी और स्थानीय प्रशासन संयुक्त रूप से कोई ‘अभियान’ चलाएंगे? या फिर यह मामला भी पाउच की तरह धीरे-धीरे दांतों तले दबकर रह जाएगा?
जनता की जेब बनाम मुनाफे की जेब
अभी हाल यह है कि उपभोक्ता की जेब हल्की और जमाखोर की तिजोरी भारी हो रही है।
अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो भाव और बढ़ेंगे, और “होल्ड एंड हाई रेट” का यह मॉडल अन्य उत्पादों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।
दर्पण 24 न्यूज की सीधी अपील:
जमाखोरी व कालाबाजारी में शामिल तत्वों की पहचान हो,
स्टॉक और बिलिंग की पारदर्शी जांच हो,
और बाजार में वास्तविक कीमतों को नियंत्रित कर जनता को राहत दी जाए।
वरना कहीं ऐसा न हो कि आने वाले दिनों में कटनी की नई कहावत बन जाए—
“यहां गुटखा नहीं, ‘गोल्डखा’ बिकता है!”
