कानून छुट्टी पर, अराजकता ड्यूटी पर” — थाने में ‘स्वागत समारोह’: पुलिस मेहमान, उपद्रवी मेज़बान

देश इस समय एक अजीब दौर से गुजर रहा है, जहां कानून किताबों में सुरक्षित है और सड़कों पर अराजकता खुलेआम ड्यूटी बजा रही है। लखीमपुर खीरी से लेकर आगरा और मध्य प्रदेश के सीधी-रीवा तक जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की नहीं, बल्कि “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाले सिद्धांत की जीवंत झलक लगती हैं।
थाने में ‘स्वागत समारोह’: पुलिस मेहमान, उपद्रवी मेज़बान
सीधी के अमिलिया थाने का दृश्य तो मानो किसी फिल्म का क्लाइमेक्स हो—बस फर्क इतना कि यहां निर्देशक कोई नहीं, सब कुछ स्वतःस्फूर्त चल रहा है। हाथों में लाठी-डंडे लिए लोग थाने में ऐसे प्रवेश कर रहे हैं जैसे किसी शादी में बारात आई हो। फर्क बस इतना कि यहां “बैंड-बाजा” की जगह पत्थरबाजी और “आतिशबाजी” की जगह पुलिस गाड़ियों में आग लगाई जा रही है।
पुलिस की हालत भी देखने लायक है—रक्षक अब अपनी ही जान बचाने में व्यस्त हैं। लगता है जैसे सरकार ने नया स्लोगन जारी कर दिया हो: “अपनी सुरक्षा, अपने हाथ।”
आस्था भी अब ‘नो पार्किंग ज़ोन’ में
आगरा में अंबेडकर जयंती के नाम पर जो हुआ, उसने यह साबित कर दिया कि अब आस्था और सम्मान भी “स्थिति के अनुसार” लागू होते हैं। पवित्र प्रतीकों पर जूते पहनकर चढ़ना और फिर उसे “अभिव्यक्ति की आज़ादी” का नाम देना, आधुनिक भारत की नई परिभाषा बनती जा रही है।
प्रशासन का बयान भी कम दिलचस्प नहीं—“सब कुछ नियंत्रण में है।” शायद उनके नियंत्रण की परिभाषा आम जनता से थोड़ी अलग है।
सरकारी चश्मा: उल्टा देखने की अद्भुत कला
सरकार का चश्मा भी कमाल का है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले “खलनायक” और पत्थरबाजी व आगजनी करने वाले “वंचित नायक” नजर आते हैं। ऐसा लगता है जैसे कोई नई सामाजिक गणित विकसित हो रही हो, जिसमें समीकरण कुछ यूं है:
शांति = संदेह
हिंसा = अधिकार
वोट बैंक बनाम कानून व्यवस्था
वोट बैंक की राजनीति अब उस स्तर पर पहुंच गई है, जहां कानून व्यवस्था एक “वैकल्पिक विषय” बन चुकी है। उपद्रवियों के लिए योजनाएं हैं, सहानुभूति है, और शायद भविष्य में “अराजकता प्रोत्साहन योजना” भी आ जाए—कौन जाने!
क्या हम सच में आगे बढ़ रहे हैं?
देश विश्वगुरु बनने की राह पर है, लेकिन रास्ते में यह “अराजकता एक्सप्रेस” बार-बार ब्रेक लगा रही है। सवाल यह नहीं कि घटनाएं हो रही हैं—सवाल यह है कि क्या इन पर रोक लगाने की इच्छाशक्ति भी कहीं मौजूद है?
अगर आज भी यह सोचकर चुप रहा गया कि “सब ठीक हो जाएगा”, तो शायद कल यह पूछने का मौका भी न मिले कि “गलती कहां हुई थी?”
निष्कर्ष: देश को विकास की नहीं, फिलहाल “संयम और संतुलन” की सबसे ज्यादा जरूरत है। क्योंकि अगर कानून का डर खत्म हो गया, तो लोकतंत्र सिर्फ एक शब्द बनकर रह जाएगा—और सड़कों पर वही चलेगा, जो सबसे ज्यादा शोर मचा सके।
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