कटनी, 22 फरवरी 2026
सेशल रिपोर्ट संवाददाता राजकुमारी मिश्रा
कहते हैं “व्यापार में विश्वास जरूरी है”, लेकिन यहां तो विश्वास के साथ पासबुक, चेकबुक और एटीएम भी पैक कर लिए गए। नई बस्ती स्थित ‘बॉम्बे ब्यूटीफुल साड़ी सेंटर’ में साड़ियों से ज्यादा रंगीन निकला ऑनलाइन क्रिकेट सट्टे का कारोबार।
कहानी कुछ यूं है कि दुकान के कर्मचारी अमित दाहिया को पता ही नहीं चला कि वह कब से करोड़पति बन चुके हैं — कम से कम बैंक स्टेटमेंट तो यही कह रहे थे! बंधन बैंक, एचडीएफसी बैंक के दो खाते और आईडीबीआई बैंक में खुले चार खातों से कुल 3.29 करोड़ रुपये का ऐसा आवागमन हुआ जैसे आईपीएल में चौके-छक्के लग रहे हों। फर्क बस इतना था कि यहां बैट की जगह मोबाइल और पिच की जगह व्हाट्सएप चैट थी।
पुलिस अधीक्षक अभिनय विश्वकर्मा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि मुख्य आरोपी योगेश बजाज ने कर्मचारी के नाम पर खाते खुलवाकर पासबुक-एटीएम खुद ही “सुरक्षित” रख लिए थे। कर्मचारी के नाम की सिम से लेन-देन, और कर्मचारी को भनक तक नहीं — इसे कहते हैं आधुनिक “डिजिटल सेवा”!
जांच में खुलासा हुआ कि:
बंधन बैंक से लगभग 1.09 करोड़
एचडीएफसी के दो खातों से लगभग 1.04 करोड़
आईडीबीआई बैंक से करीब 59 लाख
यानी कुल 3 करोड़ 29 लाख 24 हजार रुपये का ऐसा खेल, जिसमें गेंद कभी कटनी तो कभी कांकेर जा रही थी।
बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ के कांकेर से 20% कमीशन पर “मास्टर आईडी” ली जाती थी। जब रकम मोटी हो जाती, तो हवाला की हवा चलती। व्हाट्सएप पर नोट नंबर मिलाए जाते और पैसा ऐसे उड़ता जैसे सट्टेबाजों का आत्मविश्वास।
इस डिजिटल ड्रामे में संत नगर के एक सज्जन तरुण मोटवानी भी कमीशन की “कड़ी” बने हुए थे। पुलिस ने योगेश बजाज, तरुण मोटवानी और अवधेश गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया है। बरामदगी में 5.52 लाख रुपये नकद, चेकबुक, एटीएम कार्ड और मोबाइल फोन मिले — जिनमें सट्टे के चैट ग्रुप्स ऐसे भरे थे जैसे परिवार के व्हाट्सएप ग्रुप में “सुप्रभात” संदेश।
मामला भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 318(4), 319(2) और पब्लिक गैंबलिंग एक्ट के तहत दर्ज हुआ है। कुछ आरोपी अभी फरार हैं — शायद अगली “ऑनलाइन बुकिंग” की तलाश में।
यह प्रकरण बताता है कि आजकल पहचान उधार, सिम उधार, खाता उधार — बस मुनाफा पक्का! आम आदमी को पता ही नहीं चलता और उसके नाम पर करोड़ों की आतिशबाजी हो जाती है।
पुलिस ने लोगों से अपील की है कि अगर कोई “बहुत ही आसान कमाई” का ऑफर दे, तो समझ जाइए — मामला साड़ी का नहीं, सट्टे का हो सकता है।
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