दतिया (मध्यप्रदेश)। झूठे आपराधिक प्रकरण दर्ज कराने के गंभीर मामलों पर न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। दतिया न्यायालय ने दुष्कर्म एवं एससी-एसटी एक्ट के तहत झूठा मामला दर्ज कराने वाली महिला को 10 वर्ष के कठोर कारावास और 10 हजार 500 रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई है। इस फैसले को न्याय व्यवस्था में झूठे मामलों की बढ़ती प्रवृत्ति पर एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
यह निर्णय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश राजेश भंडारी द्वारा दिनांक 16 अप्रैल 2026 को सुनाया गया।
रुपये के विवाद में दर्ज कराया गया था झूठा मामला
मामले के अनुसार, फरियादिया वैभवी सनोरिया ने थाना बड़ौनी में शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि 22 सितंबर 2021 की रात उसका पड़ोसी कालीचरण उसके घर में घुसा और उसके साथ दुष्कर्म किया। साथ ही जान से मारने की धमकी देने का भी आरोप लगाया गया था।
पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर जांच की और चालान न्यायालय में पेश किया। लेकिन सुनवाई के दौरान मामला पूरी तरह पलट गया।
अदालत में महिला ने स्वीकार किया सच
विचारण के दौरान फरियादिया अपने ही बयान से मुकर गई। उसने अदालत में स्वीकार किया कि रुपयों के लेनदेन के विवाद के चलते उसने कालीचरण के खिलाफ झूठा मामला दर्ज कराया था।
इस स्वीकारोक्ति के बाद अदालत ने आरोपी कालीचरण को दोषमुक्त कर दिया।
अदालत की सख्त टिप्पणी
फैसला सुनाते हुए न्यायालय ने कहा कि हाल के समय में झूठे आपराधिक प्रकरण दर्ज कराने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है, जो न्याय प्रणाली के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी में कहा—
“ऐसे मामलों से न केवल न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है बल्कि आम लोगों के बीच न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास भी बढ़ता है।”
आरोपी पर भी दर्ज हुआ नया मामला
झूठा मामला साबित होने के बाद अदालत के निर्देश पर फरियादिया के खिलाफ भी कार्रवाई की गई और उसके विरुद्ध नया प्रकरण दर्ज किया गया।
अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 182, 195 एवं 211 के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई।
अभियोजन पक्ष की दलीलें
मामले में शासन की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक अरुण कुमार लिटोरिया ने पैरवी की। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कुल पांच गवाहों के बयान प्रस्तुत किए, जिन्हें अदालत ने महत्वपूर्ण आधार माना।
कानूनी विशेषज्ञ की प्रतिक्रिया
इस मामले पर कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि झूठे मुकदमों से वास्तविक पीड़ितों के मामलों की गंभीरता प्रभावित होती है और न्यायिक प्रक्रिया पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है।
संकेत साहू ने भी कहा कि ऐसे फैसले समाज में गलत शिकायतों पर अंकुश लगाने में मदद करेंगे और न्याय प्रणाली में विश्वास मजबूत करेंगे।
निष्कर्ष
दतिया न्यायालय का यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि कानून का दुरुपयोग करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। झूठे आरोप लगाकर किसी निर्दोष को फंसाने की कोशिश न केवल अपराध है, बल्कि इसके गंभीर कानूनी परिणाम भी भुगतने पड़ सकते हैं।
यह निर्णय न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता और विश्वास बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
दुष्कर्म व एससी-एसटी एक्ट में झूठा मामला दर्ज कराने पर महिला को 10 साल की सजा, न्यायालय की सख्त टिप्पणी
