देश का काला इतिहास: दलेलचक-बघौरा नरसंहार में 55 लोगों की निर्मम हत्या, आज भी सिहर उठता है बिहार

पटना | दर्पण 24 न्यूज//भारत के इतिहास में कई ऐसी घटनाएं दर्ज हैं, जिन्हें याद कर आज भी रूह कांप उठती है। ऐसी ही एक भयावह घटना 29 मई 1987 की रात बिहार के औरंगाबाद जिले में हुई थी, जिसे दलेलचक-बघौरा नरसंहार के नाम से जाना जाता है। इस नरसंहार में 55 लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई, जिनमें महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल थे। यह घटना न सिर्फ बिहार, बल्कि पूरे देश के इतिहास पर एक काला धब्बा बनकर दर्ज है।
कैसे हुआ नरसंहार
29 मई 1987 की रात करीब 500 हथियारबंद लोगों की भीड़ “एमसीसी जिंदाबाद” के नारे लगाते हुए दलेलचक और बघौरा गांव की ओर बढ़ी। हमलावरों के पास बंदूकें, कुल्हाड़ी, गड़ासा और पेट्रोल से भरे डिब्बे थे।
भीड़ ने दोनों गांवों को घेर लिया और सुनियोजित तरीके से हमला शुरू किया।
पुरुषों को घरों से खींचकर बाहर लाया गया
हाथ-पैर बांधकर बरगद के पेड़ से बांध दिया गया
फिर कुल्हाड़ी और गड़ासों से काट-काटकर हत्या कर दी गई
महिलाओं और बच्चियों के साथ अमानवीय अत्याचार किए गए। कई के साथ दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई और शवों को दफना दिया गया। छोटे बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया।
बरगद का पेड़ बना मौत का गवाह
गांव के बाहर खड़ा एक बरगद का पेड़ इस नरसंहार का सबसे भयावह प्रतीक बन गया।
यहां 29 लोगों के शव बंधे मिले, जिनके शरीर के टुकड़े अलग-अलग पड़े थे। पूरा इलाका खून से लाल हो गया था, मानो कोई बूचड़खाना हो।
2 घंटे बाद पहुंची पुलिस
घटना स्थल से महज 3 किलोमीटर दूर थाना होने के बावजूद पुलिस तत्काल नहीं पहुंची।
करीब दो घंटे बाद पुलिस गांव पहुंची, तब तक हमलावर फरार हो चुके थे और गांव जल रहा था।
सुबह जब लाशों की गिनती हुई तो:
कुल 55 लोगों की मौत हुई
इनमें 54 राजपूत और 1 दलित शामिल था
7 परिवार ऐसे थे जिनमें कोई जीवित नहीं बचा
मुख्यमंत्री भी हुए भावुक
घटना के दो दिन बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे गांव पहुंचे।
वहां का मंजर देखकर वे भी भावुक हो गए। एक बुजुर्ग अपने पोते-पोती को गोद में लेकर रो रहा था—उसके पूरे परिवार की हत्या हो चुकी थी।
क्या थी नरसंहार की वजह?
यह नरसंहार केवल एक हिंसक घटना नहीं, बल्कि जमीन विवाद, जातीय तनाव और नक्सली गतिविधियों का परिणाम था।
इलाके में जमीन पर कब्जे को लेकर राजपूत और पिछड़ी जातियों के बीच विवाद था
माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (MCC) इस संघर्ष में सक्रिय था
इससे पहले भी कई हत्याएं हुई थीं, जिनके बदले की भावना बढ़ती गई
“सात का बदला सत्तर से” लेने की धमकी के बाद यह नरसंहार हुआ
राजनीतिक असर: कांग्रेस की गिरावट
इस घटना ने बिहार की राजनीति को हिला दिया।
सरकार पर लापरवाही के आरोप लगे
1988 में मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे को इस्तीफा देना पड़ा
1990 चुनाव में कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ
इसके बाद राज्य में जनता दल की सरकार बनी और लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने।
तब से लेकर आज तक बिहार में कांग्रेस का कोई मुख्यमंत्री नहीं बन पाया।
न्यायिक कार्रवाई
177 लोगों को आरोपी बनाया गया
1992 में 8 को फांसी की सजा सुनाई गई
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सजा को उम्रकैद में बदल दिया
2011 तक सभी दोषी जेल से छूट गए
आज भी जिंदा है खौफ
नरसंहार के बाद:
ज्यादातर पीड़ित परिवार गांव छोड़कर चले गए
कई घर आज भी वीरान पड़े हैं
गांव को लंबे समय तक “भूतहा गांव” कहा जाता रहा
निष्कर्ष
दलेलचक-बघौरा नरसंहार केवल एक अपराध नहीं था, बल्कि यह उस दौर की भयावह सच्चाई थी, जब बिहार जातीय हिंसा और नक्सली आतंक की चपेट में था। यह घटना आज भी याद दिलाती है कि सामाजिक विभाजन और प्रशासनिक लापरवाही किस हद तक विनाशकारी हो सकती है।
यह देश के इतिहास का वह काला अध्याय है, जिसे भुलाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव है।

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