कटनी/बिलहरी।कहते हैं मेहनत की कमाई ही सच्ची कमाई होती है… लेकिन बिलहरी में शायद यह कहावत अब पुरानी हो चुकी है। यहां अब लोग पसीना बहाकर कमाने से ज्यादा “नंबर लगाने” में विश्वास करने लगे हैं। हालात ऐसे बन चुके हैं कि बिलहरी धीरे-धीरे सट्टे का गढ़ बनता जा रहा है और यह सब खुलेआम हो रहा है—इतना खुलेआम कि मानो सट्टा नहीं, कोई किराना दुकान चल रही हो।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार क्षेत्र में सट्टा गिरोह पूरी तरह सक्रिय हैं। गरीब मजदूर वर्ग, जो दिनभर मेहनत करके कुछ पैसे जुटाता है, वही पैसा शाम होते-होते “किस्मत आजमाने” में झोंक देता है। घर में भले ही चूल्हा न जले, लेकिन सट्टा खेलने का जोश कम नहीं होता। ऐसा लगता है जैसे “रोटी बाद में, नंबर पहले” का नया सिद्धांत यहां लागू हो चुका है।
🔳 प्रशासन को नहीं दिखता या देखना नहीं चाहता?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब आम जनता को पता है कि सट्टा चल रहा है, तो क्या पुलिस और प्रशासन को इसकी भनक नहीं है?
या फिर मामला कुछ ऐसा है कि—
“देखो, सुनो… पर कुछ मत करो!”
लोगों का कहना है कि यह अवैध कारोबार कई दिनों से चल रहा है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी मानो आंखों पर पट्टी बांधकर बैठे हैं। अब यह समझ पाना मुश्किल है कि यह लापरवाही है या जानबूझकर चुप्पी।
🔳 जनता भी कम जिम्मेदार नहीं
व्यंग्य की बात यह भी है कि जहां सट्टा चल रहा है, वहां की जनता भी चुप बैठी है।
न कोई विरोध, न कोई शिकायत—बस “अपना नंबर लगाओ और चुपचाप घर जाओ” वाली मानसिकता हावी है।
ऐसा लगता है कि लोगों ने मान लिया है कि—
“अगर किस्मत से पैसा मिल जाए, तो मेहनत क्यों करें?”
🔳 सट्टा: सपनों का शॉर्टकट या बर्बादी का रास्ता?
सट्टा भले ही लोगों को जल्दी अमीर बनने का सपना दिखाता हो, लेकिन हकीकत में यह गरीब परिवारों को और ज्यादा कर्ज और संकट में डाल रहा है।
कई घरों में रोज़ के खर्च के पैसे तक इस खेल में खत्म हो रहे हैं।
🔳 बड़ा सवाल अभी भी कायम
क्या प्रशासन को सच में जानकारी नहीं है?
अगर है, तो कार्रवाई क्यों नहीं?
और अगर नहीं है, तो क्या जनता की आवाज अब इतनी कमजोर हो चुकी है?
फिलहाल बिलहरी में सट्टा ऐसे चल रहा है जैसे यह कोई गैरकानूनी काम नहीं, बल्कि रोजमर्रा का कारोबार हो।
अब देखना यह है कि जिम्मेदार लोग कब जागते हैं—
या फिर बिलहरी सच में “सट्टा नगरी” बनने की राह पर आगे बढ़ता रहेगा।
(दर्पण 24 न्यूज के लिए विशेष रिपोर्ट)
बिलहरी: जहां ‘किस्मत’ की दुकानें किराने से भी ज्यादा चलती हैं!सट्टे का गढ़ बना बिलहरी, प्रशासन ‘मूक दर्शक’ या ‘अनजान खिलाड़ी’?
