पहले फीस दो, फिर विदेश का सपना देखो” — ओबीसी युवाओं के लिए सरकार की ‘उड़ान’ योजना या ‘उधार’ योजना?

दर्पण 24 न्यूज़ कटनी।
सरकार ने एक बार फिर युवाओं के सपनों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने का बीड़ा उठाया है। नाम बड़ा आकर्षक है — “सोशल इम्पैक्ट बॉन्ड आधारित परियोजना”। सुनते ही लगता है कि अब गांव का आईटीआई पास लड़का सीधे जर्मनी में मशीन चला रहा होगा और जापान में रोबोट से हाथ मिला रहा होगा।
लेकिन जैसे ही योजना की बारीकियां सामने आती हैं, तो युवा का सपना थोड़ा “इम्पैक्ट” होकर जमीन पर आ गिरता है।
🔳 “15% फीस दो, बाकी सपना खुद पूरा करो
योजना के अनुसार, आर्थिक रूप से कमजोर ओबीसी युवाओं को पहले अपनी जेब ढीली करनी होगी। प्रशिक्षण शुल्क का 15% पहले जमा करो, फिर आगे बढ़ो।
अब सवाल ये है कि जब युवा “आर्थिक रूप से कमजोर” है, तो वो 15% कहां से लाए?
शायद योजना बनाने वालों को लगा होगा कि गरीब युवा के पास “विदेश जाने का सपना” तो है ही, पैसे भी कहीं न कहीं से जुगाड़ हो ही जाएंगे!
🔳 विदेश जाने से पहले “खर्चों का विदेश”
योजना में साफ लिखा है—
विमान किराया खुद दो
भोजन खर्च खुद उठाओ
बार-बार परीक्षा देने का खर्च खुद करो
मतलब साफ है:
सरकार आपको विदेश भेजने में मदद करेगी… बस पैसा, टिकट, खाना और बाकी सब आप खुद संभालिए!
🔳 तीन हफ्ते में अगर “मन बदल गया” तो पैसा वापस!
योजना में एक और दिलचस्प बात—
अगर तीन हफ्ते में आप ड्रॉप आउट हो गए या प्लेसमेंट नहीं मिला, तो फीस वापस मिल सकती है।
अब सवाल ये है—
क्या तीन हफ्ते में कोई तय कर सकता है कि जर्मनी की ठंड झेल पाएगा या जापान की भाषा समझ पाएगा?
या फिर ये भी एक “ट्रायल पैक” की तरह है—
“पहले इस्तेमाल करें, पसंद आए तो विदेश जाएं!”
🔳 600 युवाओं का चयन — बाकी 6 लाख देखें सपना
करीब 600 युवाओं को विदेश भेजने की बात कही गई है।
अब जिले के हजारों आईटीआई पास युवाओं के बीच ये 600 सीटें वैसी ही हैं जैसे रेलवे में “तत्काल टिकट”—
जिसे मिल जाए वो भाग्यशाली, बाकी लोग बस स्क्रीन देखते रह जाएं।
🔳 योजना या “जिम्मेदारी ट्रांसफर”?
कुल मिलाकर यह योजना कुछ ऐसी लगती है—
सरकार कह रही है:
👉 “हम अवसर देंगे”
और युवा से कहा जा रहा है:
👉 “बाकी सब तुम खुद देख लो”
🔳 निष्कर्ष: सपना बड़ा है, लेकिन जेब उससे भी बड़ी चाहिए
विदेश में नौकरी का सपना हर युवा देखता है, लेकिन इस योजना में सपना देखने के साथ-साथ खर्च उठाने की क्षमता भी जरूरी है।
अब देखना ये है कि यह योजना
वास्तव में गरीब युवाओं को आगे बढ़ाएगी
या फिर
सिर्फ उन तक सीमित रह जाएगी जिनके पास पहले से ही थोड़ा ‘विदेशी बजट’ है।
📢 दर्पण 24 न्यूज का सवाल:
क्या “आर्थिक रूप से कमजोर” युवाओं के लिए बनाई गई योजना में इतना आर्थिक बोझ डालना सही है?
या फिर ये योजना सिर्फ कागजों में ही “सोशल इम्पैक्ट” दिखाएगी?

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