दर्पण 24 न्यूज़ का उद्देश्य किसी को कठघरे में खड़ा करना नहीं,
बल्कि यह पूछना है—
जब बात अपने ही घर की हो, तो जयकार से डर कैसा?
भारत में रहना है, भारत का पानी पीना है, भारत की हवा में साँस लेनी है… लेकिन जब बात आती है “भारत माता की जय” या “वन्दे मातरम्” कहने की, तो कुछ लोगों को अचानक लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक बहस याद आ जाती है।
सवाल यह नहीं कि कौन बोले और कौन न बोले। सवाल यह है कि आखिर इन नारों से दिक्कत क्यों?
“भारत माता” – भावना या बहस?
“भारत माता” कोई सरकारी विभाग नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रतीकात्मक छवि है।
“वन्दे मातरम्” कोई नया नारा नहीं, बल्कि आज़ादी की लड़ाई में गूँजने वाली पुकार रहा है, जो पहली बार आनंदमठ में सामने आया और बाद में स्वतंत्रता आंदोलन का जोश बना।
तो फिर समस्या कहाँ है?
समस्या शायद शब्दों में कम, मानसिकता में ज़्यादा है।
देशभक्ति: घोषणा या अनुभूति?
कुछ लोग कहते हैं—देशभक्ति दिल में होनी चाहिए, ज़ुबान पर नहीं।
बिल्कुल सही बात है।
लेकिन जब दिल की देशभक्ति ज़ुबान पर आने में संकोच करे, तो शक होना स्वाभाविक है।
व्यंग्य यही है—
क्रिकेट में “इंडिया-इंडिया” चिल्लाने में गला नहीं बैठता,
लेकिन “भारत माता की जय” कहते ही गला सूख जाता है!
राजनीति का मसाला
सच यह भी है कि इन नारों को लेकर राजनीति ने खूब मसाला बनाया है।
एक पक्ष इसे राष्ट्रभक्ति की कसौटी बना देता है,
दूसरा पक्ष इसे स्वतंत्रता की परीक्षा समझ लेता है।
नतीजा?
नारा कम, बहस ज्यादा।
भावना कम, बयान ज्यादा।
असली समस्या क्या है?
असल में समस्या न “भारत माता” से है, न “वन्दे मातरम्” से।
समस्या है—हमारी सामूहिक असुरक्षा और राजनीतिक खींचतान से।
देशभक्ति न तो केवल नारे में सिमटती है,
न ही नारा बोलने से कोई कम या ज्यादा देशभक्त हो जाता है।
लेकिन व्यंग्य यह जरूर कहता है—
जो देश में रहकर, देश की हर सुविधा लेकर भी देश के प्रतीकों से असहज हो,
उसे कम से कम यह तो बताना चाहिए कि दिक्कत शब्द से है या भावना से?
निष्कर्ष: नारा नहीं, नजरिया बदलें
देशभक्ति की असली परीक्षा सड़क, संसद या सोशल मीडिया पर नहीं,
बल्कि ईमानदारी, कर्तव्य और जिम्मेदारी में है।
“भारत माता की जय” कहना या न कहना व्यक्तिगत निर्णय हो सकता है,
लेकिन भारत के सम्मान और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता सबकी जिम्मेदारी है।

