कंक्रीट के जंगल में दब गई एक ज़िंदगी! फैक्ट्री में हादसा, जिम्मेदारी पर ‘कंक्रीट’ सन्नाटा, पवन मित्तल की कंक्रीट फैक्ट्री में हुए हादसे में 26 वर्षीय सतीश काछी (कुशवाहा) की दर्दनाक मौत हो गई।

कटनी से राजकुमारी मिश्रा की रिपोर्ट | दर्पण 24 न्यूज़

माधव नगर थाना अंतर्गत झिंझरी चौकी क्षेत्र में स्थित एक कंक्रीट फैक्ट्री में काम कर रहे मजदूर की मौत ने फिर सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या फैक्ट्रियों में सुरक्षा सिर्फ बोर्ड पर लिखे नियमों तक सीमित है? पवन मित्तल की कंक्रीट फैक्ट्री में हुए हादसे में 26 वर्षीय सतीश काछी (कुशवाहा) की दर्दनाक मौत हो गई। कंक्रीट से इमारतें तो खड़ी हो जाती हैं, लेकिन एक मजदूर की जान की कीमत आखिर कितनी होती है—यह सवाल हवा में तैर रहा है।

फोन आया… और सब खत्म

प्राप्त जानकारी के अनुसार मर्ग क्रमांक 17/26 धारा 194 बी.एन.एस.एस. के तहत जांच की गई। मृतक के पिता संतोष काछी (45), निवासी ग्राम चरगवां ने पुलिस को बताया कि उनका बेटा सतीश पिछले तीन वर्षों से उक्त फैक्ट्री में मजदूरी कर रहा था और गुलबारा स्थित अरूण हल्दकार के प्लॉट में रहता था।

20 फरवरी 2026 को दोपहर लगभग 1:30 बजे एक फोन कॉल आया—“एक्सीडेंट हो गया है।” इसके बाद खबर आई कि सतीश अब इस दुनिया में नहीं रहा। परिजन जब जिला अस्पताल कटनी पहुंचे, तो उनका बेटा पोस्टमार्टम कक्ष में था। सिर और बाएं पैर में गंभीर चोटें, शरीर से बहता खून… और घर में पसरा सन्नाटा।

मशीन चली… जिम्मेदारी फिसली?

बताया गया कि सुबह 8 बजे से शाम 5 बजे तक की ड्यूटी में सतीश रोज की तरह काम कर रहा था। दोपहर करीब 1 बजे इंजीनियर विपिन, सुपरवाइजर राकेश हल्दकार और हेड्रा मशीन चालक अतुल केवट की मौजूदगी में बेल्ट के जरिए कंक्रीट मशीन को एक स्थान से दूसरे स्थान पर शिफ्ट किया जा रहा था।

आरोप है कि इसी दौरान बेल्ट से मशीन फिसल गई और पास में खड़े सतीश के ऊपर आ गिरी। सवाल यह है कि जब भारी मशीनरी का संचालन हो रहा था, तब सुरक्षा के क्या इंतजाम थे? क्या मजदूरों को सुरक्षित दूरी पर रखा गया था, या “जल्दी काम निपटाओ” का दबाव भारी पड़ गया?

FIR दर्ज… लेकिन क्या इतना काफी?

पुलिस ने प्रथम दृष्टया लापरवाही मानते हुए इंजीनियर विपिन, सुपरवाइजर राकेश हल्दकार और चालक अतुल केवट के खिलाफ धारा 289, 106(1), 3(5) भारतीय न्याय संहिता के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

कानूनी कार्रवाई अपनी जगह है, लेकिन हर हादसे के बाद वही पुराना क्रम दोहराया जाता है—
पहले लापरवाही, फिर मौत, फिर मुआवजे की चर्चा, और अंत में फाइलों में दबती जिम्मेदारी।

सुरक्षा या सिर्फ औपचारिकता?

औद्योगिक इकाइयों में सेफ्टी हेलमेट, सेफ्टी बेल्ट और चेतावनी बोर्ड तो लगे मिल जाते हैं, लेकिन क्या उन नियमों का पालन भी होता है? या वे सिर्फ निरीक्षण के दिनों में ही जीवित हो उठते हैं?

कटनी में यह पहला मामला नहीं है जब फैक्ट्री में लापरवाही से मजदूर की जान गई हो। सवाल यह भी है कि क्या फैक्ट्री प्रबंधन की जवाबदेही तय होगी, या सारा बोझ केवल कुछ कर्मचारियों पर डालकर मामला शांत कर दिया जाएगा?

एक परिवार का भविष्य अधर में

तीन साल से मेहनत कर घर चला रहा सतीश अब नहीं है। पीछे रह गए माता-पिता के आंसू और यह कसक कि “अगर सुरक्षा पुख्ता होती तो शायद बेटा जिंदा होता।”

दर्पण 24 न्यूज़ का सवाल सीधा है—
क्या मजदूरों की जान की कीमत सिर्फ FIR और मुआवजे तक सीमित है?
या अब वक्त आ गया है कि फैक्ट्रियों में सुरक्षा को “खर्च” नहीं, “जरूरत” समझा जाए?

आप अपनी राय हमें जरूर भेजें।

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