भोपाल। दर्पण 24 न्यूज़ स्पेशल रिपोर्ट
संपादक दिनेश पाण्डेय की कलम से
कोरोना महामारी ने जहां आम जनता की कमर तोड़ दी थी, वहीं कुछ सरपंच-सचिवों के लिए यह कालखंड किसी “स्वर्णिम अवसर योजना” से कम नहीं रहा। हाल ही में विधानसभा में पेश हुई ऑडिट रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि प्रदेश की पंचायतों में विकास कार्य कम और “विकास राशि का विकास” ज्यादा हुआ।
रिपोर्ट बताती है कि कोरोना के दौरान मिले अतिरिक्त कार्यकाल का उपयोग जनसेवा के बजाय “धन सेवा” में किया गया। नियमों को ऐसे साइड में रखा गया जैसे शादी में दूर के रिश्तेदार को रखा जाता है — बुलाया भी और नजरअंदाज भी किया।
⚰️ अंत्येष्टि में भी अवसर!
गरीबों की अंतिम यात्रा में मदद के लिए बनी मुख्यमंत्री संबल योजना भी भ्रष्टाचारियों की संवेदनशीलता की भेंट चढ़ गई।
31 जिलों की 576 पंचायतों ने मृतकों के नाम पर 1.27 करोड़ रुपये निकाल लिए। कुछ जगह तो हालात ऐसे मिले कि गांव वाले बोले — “हमारे यहां तो कोई मरा ही नहीं… पैसा किसकी आत्मा की शांति के लिए निकला?”
सीहोर, उज्जैन, सागर और गुना जिलों में यह खेल सबसे ज्यादा पकड़ा गया। लगता है वहां फाइलों में आत्माएं ज्यादा सक्रिय थीं।
🧾 बिना टेंडर का प्रेम
रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि 4261 पंचायतों ने बिना टेंडर 69 करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान कर दिया।
जब ऑडिट टीम ने पूछा — “सामग्री कहां है?”
तो जवाब शायद मन ही मन मिला होगा — “सामग्री आत्मनिर्भर बनकर अदृश्य हो गई है।”
स्टॉक रजिस्टर में एंट्री नहीं, सामान का पता नहीं… पर भुगतान पूरा। यह वित्तीय योग विद्या का नया अध्याय माना जा सकता है।
📂 दस्तावेज भी ‘लॉकडाउन’ में
1137 पंचायतों ने 43 करोड़ रुपये खर्च के दस्तावेज ही नहीं दिए।
लगता है कागजों ने भी कोरोना गाइडलाइन का पालन करते हुए “सोशल डिस्टेंसिंग” बना ली।
वहीं बिना मस्टर रोल 20.99 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ — यानी मजदूर भी अदृश्य, काम भी अदृश्य, लेकिन पैसा पूरी तरह दृश्य।
🏠 योजनाएं भी बनी ‘योजना’
कटनी के रीठी, सांची, विदिशा, चौरई और तामिया जनपदों में पीएम आवास, कन्यादान और स्वच्छ भारत मिशन जैसी योजनाओं में करीब 6 करोड़ रुपये का गबन सामने आया।
यहां विकास का मॉडल शायद ऐसा था — “घर कागज में बनाओ, पैसा खाते में लाओ।”
⚖️ अब कार्रवाई की तलवार
खुलासे के बाद अब दोषी सरपंच-सचिवों पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि तलवार अक्सर लटकती ही रहती है, चलती कम है।
✍️ व्यंग्य निष्कर्ष
कोरोना काल ने बहुत कुछ सिखाया — हाथ धोना, दूरी रखना, मास्क पहनना…
पर कुछ जनप्रतिनिधियों ने अलग ही सीख ली —
“मौका मिले तो खजाना धोना, नियमों से दूरी रखना और कागजों पर मास्क पहनाना।
