“फिटनेस चाहिए? तो पहले जेब की फिटनेस दिखाइए!” — जिले से जबलपुर तक का सरकारी व्यायाम

दर्पण 24 न्यूज | विशेष

जिले की जनता इन दिनों एक नए सरकारी फिटनेस प्रोग्राम में शामिल कर दी गई है। फर्क बस इतना है कि यह कार्यक्रम जिम में नहीं, बल्कि सड़क पर कराया जा रहा है — और वह भी सीधे जबलपुर तक।

जी हां, अब वाहन की फिटनेस करवानी है तो पहले अपनी जेब की फिटनेस मजबूत कर लीजिए। क्योंकि जिला मुख्यालय में दफ्तर, कर्मचारी और कुर्सियां मौजूद हैं, लेकिन फिटनेस मशीन शायद छुट्टी पर है।

🚗 “फिटनेस” का नया फार्मूला

सरकारी गणित बड़ा सीधा है —

वाहन मालिक पहले ₹3000 तक का पेट्रोल-डीजल फूंके,

फिर पूरे दिन लाइन में खड़े होकर धैर्य की परीक्षा दे,

और अंत में अगर “सिस्टम” मुस्कुरा दे तो काम हो जाए।

कहते हैं फिटनेस सेंटर आधुनिक होगा, डिजिटल होगा, पारदर्शी होगा।

बस एक छोटी सी शर्त है — वह आपके जिले में नहीं होगा।

💸 गरीब की जेब पर ‘कार्डियो एक्सरसाइज’

एक स्थानीय नागरिक ने तंज कसते हुए कहा —

“सरकार चाहती है कि जनता भी फिट रहे। इसलिए उन्हें सुबह-सुबह दूसरे शहर भेज दिया जाता है, ताकि पेट्रोल पंप, होटल और चाय की दुकानों की भी फिटनेस बनी रहे।”

जनता पूछ रही है

जब जिले में दफ्तर हैं, कर्मचारी हैं, भवन हैं, तो फिटनेस सेंटर खोलना क्या किसी चंद्रयान मिशन से कम है?

🏢 घोषणाओं की मसल पावर

सरकारी घोषणाएं हमेशा ‘मजबूत’ रहती हैं।

पर जमीनी हकीकत अक्सर कमजोर नजर आती है।

जिले में फिटनेस सेंटर नहीं, पर आश्वासन भरपूर हैं।

जनता का समय जा रहा है, पैसा जा रहा है, धैर्य जा रहा है —

बस सुविधा अभी “प्रोसेस में” है।

❓ जनता के सवाल, जवाब कब?

क्या जिले में फिटनेस सेंटर खोलना इतना कठिन है?

क्यों हर काम के लिए आम आदमी को बड़े शहर का टिकट कटाना पड़ता है?

क्या सुविधा का मतलब सिर्फ विज्ञापन तक सीमित है?

🔍 अंत में…

सरकार कहती है — “व्यवस्था सुधार रहे हैं।”

जनता कहती है — “पहले हमें भटकाना बंद कीजिए।”

अगर यही हाल रहा, तो वाहन की फिटनेस से पहले जनता की सहनशक्ति की फिटनेस टेस्ट होती रहेगी।

और तब तक जिले के लोग यही कहते रहेंगे —

“सरकार सुविधा दे रही है या सिर्फ यात्रा भत्ता बढ़ा रही है?”

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