कटनी। प्रदेश के साथ-साथ कटनी जिला में धान की मिलिंग लगभग ठप पड़ी हुई है। नाममात्र की मिलिंग ही हो पा रही है। मिलर्स अपनी विभिन्न मांगों को लेकर अड़े हुए हैं और विभाग व सरकार से अब तक कोई ठोस निष्कर्ष न निकलने के कारण मिलिंग कार्य आगे नहीं बढ़ पा रहा है।
जिले में करीब 4 लाख 94 हजार मीट्रिक टन धान की मिलिंग प्रस्तावित है। कुल 117 राइस मिलों में से केवल 83 मिलर्स ने ही अनुबंध किया है। कुछ मिलर्स ने धान का उठाव तो कर लिया है, लेकिन शर्तें पूरी न होने का हवाला देते हुए सरकारी गोदामों में चावल जमा नहीं कर रहे हैं।
पल्लेदारी और परिवहन दरों को लेकर असंतोष
मिलर्स का कहना है कि उन्हें पल्लेदारी के नाम पर मात्र 4.76 रुपये प्रति क्विंटल भुगतान किया जा रहा है, जबकि वास्तविक खर्च 24 से 25 रुपये प्रति क्विंटल तक आता है।
परिवहन भाड़े को लेकर भी नाराजगी है। 15 किलोमीटर का वास्तविक खर्च करीब 1800 रुपये पड़ता है, लेकिन भुगतान केवल 8 किलोमीटर के हिसाब से किया जा रहा है। ट्रकों की दो-दो दिन की हॉल्टिंग से अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।
रिकवरी को लेकर बड़ा विवाद
सबसे गंभीर मुद्दा चावल रिकवरी का है। मिलर्स के अनुसार एक क्विंटल धान से औसतन 40 से 45 किलो चावल निकल रहा है, जबकि सरकार 67 किलो चावल जमा कराने की शर्त रख रही है। इससे प्रति क्विंटल करीब 27 किलो का नुकसान मिलर्स को उठाना पड़ रहा है।
हाइब्रिड धान में ब्रोकन चावल की मात्रा अधिक होने से स्थिति और खराब हो गई है। कई मिलर्स ने मिलिंग पूरी तरह बंद कर दी है। फिलहाल संभाग के अन्य जिलों की तुलना में मंडला जिला में ही मिलिंग कार्य जारी बताया जा रहा है।
मंत्री से मुलाकात बेनतीजा
मिलर्स ने खाद्य विभाग और नागरिक आपूर्ति निगम के माध्यम से खाद्य मंत्री से भी मुलाकात की, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है।
पीडीएस पर भी पड़ सकता है असर
जिले में लगभग साढ़े 9 लाख पीडीएस हितग्राही हैं। प्रति सदस्य दो किलोग्राम चावल वितरण के हिसाब से हर माह करीब 20 हजार क्विंटल चावल की खपत होती है। यदि समय पर मिलिंग नहीं हुई तो आने वाले समय में चावल की कमी की स्थिति बन सकती है।
गेहूं भंडारण पर भी संकट
यदि गोदाम समय पर खाली नहीं हुए तो आगामी गेहूं भंडारण में भारी परेशानी खड़ी हो सकती है। खुले में रखी धान के खराब होने और औने-पौने दाम में नीलामी की आशंका भी बढ़ गई है।
अब निगाहें सरकार और मिलर्स के बीच संभावित समझौते पर टिकी हैं। यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो इसका सीधा असर सार्वजनिक वितरण प्रणाली और आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
