गायत्री नगर में समस्या नहीं, ‘प्रक्रिया’ रहती है — जनता लाइन में, फाइल आराम में!”

दर्पण 24 न्यूज़ | रिपोर्ट: राजकुमारी मिश्रा

गायत्री नगर में इन दिनों दो चीज़ें सबसे ज्यादा सक्रिय हैं—एक जनता की परेशानी और दूसरी दफ्तरों की “प्रक्रिया”। आम नागरिकों का कहना है कि समस्या इतनी पुरानी हो चुकी है कि अब उसे वार्ड का स्थायी निवासी घोषित कर देना चाहिए।

स्थानीय लोगों ने कलेक्टर महोदय को ज्ञापन सौंपा, नगर निगम आयुक्त को ज्ञापन दिया और क्षेत्रीय विधायक संदीप जयसवाल को भी आवेदन थमाया। लेकिन लगता है कि ज्ञापनों का भी अपना भाग्य होता है—कुछ पर कार्रवाई होती है और कुछ फाइलों के बीच ध्यान मुद्रा में बैठ जाते हैं।

पहले लेटर दीजिए, फिर देखेंगे”

नगर निगम के अधिकारियों का कहना है—“आप हमें लिखित में दीजिए, फिर जांच होगी।”

जनता पूछ रही है—“जब तक हम लिखते रहेंगे, तब तक गड्ढे बढ़ते रहेंगे क्या?”

गायत्री नगर के नागरिकों का दर्द यह है कि हर बार उन्हें नए कागज़, नए आवेदन और नई तारीख़ मिलती है, लेकिन पुरानी समस्या वहीं की वहीं खड़ी मुस्कुरा रही है। लगता है समस्या और प्रशासन के बीच कोई गहरा गठबंधन है—एक हटता नहीं और दूसरा हटाता नहीं।

हादसे का इंतज़ार?

स्थानीय लोगों का सवाल है—क्या शासन-प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है? क्या कार्रवाई का अलार्म तभी बजेगा जब कोई अप्रिय घटना हो जाएगी?

गायत्री नगर में लोग कहते हैं कि यहाँ समाधान नहीं, “संभावनाएं” दी जाती हैं। अधिकारी कहते हैं—“जांच होगी।”

जनता कहती है—“कब?”

अधिकारी कहते हैं—“प्रक्रिया में है।”

जनता कहती है—“हम भी प्रक्रिया में ही जी रहे हैं।”

तानाशाही या तंद्रा?

नागरिकों का आरोप है कि नगर निगम की कार्यप्रणाली तानाशाही जैसी प्रतीत हो रही है। समस्या के समाधान के बजाय जनता को कागज़ी भूलभुलैया में भेज दिया जाता है। ऐसा लगता है जैसे हर शिकायत को एक यात्रा पर भेज दिया जाता है—फाइलों के पहाड़ों के बीच, जहां से वापसी की कोई गारंटी नहीं।

गायत्री नगर की जनता का सीधा संदेश है—“हमें आश्वासन नहीं, समाधान चाहिए।”

अब देखना यह है कि प्रशासन इस व्यंग्य को संदेश समझता है या फिर इसे भी ‘लेटर लिखकर दीजिए’ की श्रेणी में डाल देता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *