कटनी। जिले में इन दिनों सोना-चांदी नहीं, बल्कि गुटखा नई “कीमती धातु” बन गया है। हालात ऐसे हैं कि अगर किसी के पास राजश्री गुटखा या सिग्नेचर गुटखा का स्टॉक मिल जाए, तो समझिए उसने छोटा-मोटा खजाना खोज लिया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कटनी में गुटखा अब स्वाद से ज्यादा “स्टेटस सिंबल” बन चुका है। पहले लोग जेब से 5-10 रुपये निकालकर शौक पूरा कर लेते थे, अब ऐसा लगता है मानो EMI पर गुटखा खरीदना पड़ेगा। दुकानदारों की मुस्कान और ग्राहकों की जेब—दोनों का सीधा उल्टा अनुपात बन गया है।
रेट सुनकर ग्राहक का ब्लड प्रेशर हाई
जिले में गुटखा के दाम इस कदर बढ़ चुके हैं कि ग्राहक पहले रेट सुनता है, फिर एक लंबी सांस लेता है और फिर सोचता है—“भाई, आज छोड़ ही देते हैं!”
हालांकि “छोड़ने” का यह विचार अक्सर अगले ही पान ठेले तक सीमित रह जाता है।
ओरिजिनल है या ‘ऑरिजनल’ का भाई?
स्थिति इतनी दिलचस्प हो गई है कि अब लोग गुटखा खरीदते समय उसकी असलियत पर भी रिसर्च कर रहे हैं।
“भैया ये असली है ना?”
“100% असली… बस दाम थोड़ा नकली है!”
यानी अब गुटखा खरीदना किसी इंटरव्यू से कम नहीं—जहां ग्राहक सवाल पूछता है और दुकानदार आत्मविश्वास से जवाब देता है।
कुछ लोग तो मजाक में कह रहे हैं कि “कटनी में गुटखा बेचने वालों को ‘आर्थिक स्वतंत्रता सेनानी’ घोषित कर देना चाहिए!”
प्रशासन की ‘मौन साधना’
जहां एक तरफ दुकानदार रेट बढ़ाने में व्यस्त हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासन मानो “ध्यान योग” में लीन नजर आ रहा है।
स्थानीय लोग मांग कर रहे हैं कि इस पूरे मामले की जांच हो और कालाबाज़ारी करने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाए।
निष्कर्ष: गुटखा नहीं, ‘लक्ज़री आइटम’
कटनी में गुटखा अब सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि एक “लक्ज़री आइटम” बन चुका है।
अगर हालात ऐसे ही रहे, तो आने वाले समय में लोग शादी-ब्याह में गहनों के साथ गुटखे के पैकेट भी गिफ्ट करते नजर आ सकते हैं—“लो भैया, ये रहा आपका प्रीमियम गुटखा पैक!”
अब देखना यह है कि प्रशासन इस “मसालेदार संकट” पर कब तक चुप रहता है, या फिर कोई ऐसी कार्रवाई होती है जिससे आम जनता को राहत मिल सके… वरना कटनी में गुटखा जल्द ही शेयर मार्केट में लिस्ट होने वाला अगला प्रोडक्ट बन सकता है!
कटनी में गुटखा की ‘गोल्ड रश’: जेब हल्की, लत भारी!
