मध्यप्रदेश में किसानों के लोकतांत्रिक मंच खत्म? उठ रहे सवाल—अब किसान जाएँ तो जाएँ कहाँ

कटनी/भोपाल। मध्यप्रदेश में किसानों से जुड़े विभिन्न संस्थागत और लोकतांत्रिक मंचों को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। विपक्ष और किसान संगठनों का आरोप है कि राज्य में वर्तमान भाजपा सरकार के कार्यकाल में सहकारिता चुनाव, सिंचाई (इरिगेशन) समितियों के चुनाव और मंडी चुनाव जैसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को समाप्त या निष्क्रिय कर दिया गया है। ऐसे में बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि आखिर किसान अपनी समस्याएं लेकर जाएँ तो जाएँ कहाँ?

क्या हैं प्रमुख मुद्दे?

प्रदेश में वर्षों से सहकारी समितियाँ, सिंचाई समितियाँ और कृषि उपज मंडियाँ किसानों के लिए अपनी बात रखने और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी का महत्वपूर्ण माध्यम रही हैं।

सहकारिता चुनाव किसानों को खाद-बीज वितरण और ऋण व्यवस्था में भागीदारी देते थे

सिंचाई समितियाँ जल प्रबंधन और सिंचाई व्यवस्था को स्थानीय स्तर पर नियंत्रित करती थीं

मंडी चुनाव किसानों को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार देते थे, जो उनकी उपज और दाम से जुड़े फैसलों में भूमिका निभाते थे

लेकिन हाल के वर्षों में इन चुनावों के न होने से इन संस्थाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठने लगे हैं।

किसान संगठनों की चिंता

किसान संगठनों का कहना है कि जब ये लोकतांत्रिक मंच सक्रिय थे, तब किसान सीधे अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन-प्रशासन तक अपनी आवाज पहुंचा पाते थे। अब व्यवस्थाएँ अधिकतर प्रशासनिक नियंत्रण में हैं, जिससे किसानों की सीधी भागीदारी सीमित हो गई है।

एक स्थानीय किसान नेता ने कहा,

“पहले हम अपने प्रतिनिधि चुनते थे, अब हमें सुनने वाला कोई नहीं दिखता। निर्णय ऊपर से होते हैं और किसानों की भूमिका सिर्फ पालन करने तक सीमित हो गई है।”

सरकार का पक्ष

हालांकि सरकार की ओर से समय-समय पर यह तर्क दिया जाता रहा है कि व्यवस्थाओं में सुधार, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए कुछ बदलाव किए गए हैं। सरकार का दावा है कि किसानों के हित में योजनाएं सीधे लागू की जा रही हैं, जिससे बिचौलियों की भूमिका कम हुई है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

राजनीतिक और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं का मजबूत होना किसानों के सशक्तिकरण के लिए जरूरी है। यदि चुनाव नहीं होते, तो जवाबदेही कमजोर हो सकती है और किसानों की आवाज दबने का खतरा बढ़ जाता है।

बड़ा सवाल

प्रदेश में उठता सबसे बड़ा सवाल यही है—

जब सहकारिता, सिंचाई और मंडी जैसे मंच ही निष्क्रिय हो जाएँ, तो किसान अपनी समस्याएं किसके सामने रखें?

निष्कर्ष

मध्यप्रदेश में किसानों की भागीदारी और प्रतिनिधित्व को लेकर यह मुद्दा अब राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बनता जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार इन चिंताओं का समाधान किस तरह करती है और क्या किसानों को फिर से मजबूत लोकतांत्रिक मंच मिल पाएंगे या नहीं।

दर्पण 24 न्यूज के लिए विशेष रिपोर्ट

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