दिल्ली/सोशल मीडिया। देश में इस समय सबसे बड़ी समस्या न महंगाई है, न बेरोज़गारी — बल्कि फिल्म “धुरंधर” है। जी हाँ, एस.पी. वैद के बयान के बाद यह फिल्म अचानक राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गई है।
पूर्व DGP ने सवाल उठाया कि जब दाऊद इब्राहिम के पैसों से कथित रूप से फिल्में बनती थीं, तब सब शांत थे, लेकिन अब उसी पर फिल्म बन रही है तो लोगों को “तकलीफ” हो रही है। उनके इस बयान ने सोशल मीडिया पर ऐसा तूफान खड़ा किया कि कुछ लोगों ने तो फिल्म देखे बिना ही उसे तीन बार बायकॉट कर दिया।
उधर फिल्म के निर्देशक आदित्य धार को भी समझ नहीं आ रहा कि उनकी फिल्म रिलीज हो रही है या राष्ट्रव्यापी भावनात्मक परीक्षण। सूत्रों के अनुसार, उन्होंने अब अगली फिल्म का नाम “किसी को बुरा न लगे” रखने पर विचार शुरू कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में फिल्में अब मनोरंजन का माध्यम कम और “भावनाओं की वार्षिक परीक्षा” ज्यादा बन गई हैं। हर दर्शक अपने-अपने चश्मे से फिल्म देखता है — कोई इसे देशभक्ति मानता है, तो कोई प्रोपेगेंडा, और कुछ लोग तो सिर्फ टिकट के दाम देखकर ही आहत हो जाते हैं।
दर्पण 24 न्यूज के सांस्कृतिक विश्लेषकों के अनुसार, देश में अब दो तरह की फिल्में बन रही हैं:
जिन्हें देखकर लोग नाराज़ हो जाते हैं
और जिन्हें देखकर लोग सोचते हैं कि नाराज़ क्यों नहीं हुए
इस बीच, आम जनता का कहना है कि उन्हें बस अच्छी कहानी चाहिए, लेकिन वो भी इस शर्त के साथ कि उसमें किसी की भावना आहत न हो — जो कि लगभग उतना ही कठिन है जितना बिना बहस के व्हाट्सएप ग्रुप चलाना।
निष्कर्ष:
फिल्म “धुरंधर” हिट होगी या फ्लॉप, ये तो बॉक्स ऑफिस बताएगा…
लेकिन देश में बहस का धंधा ज़रूर सुपरहिट चल रहा है।
(दर्पण 24 न्यूज — खबर वही, तड़का नया!)
फिल्म बने तो दर्द, नहीं बने तो सर्द” — धुरंधर पर देश का नया सांस्कृतिक बुखार
