छपरा (बिहार) | देश की राजनीति में बयान देने की रफ्तार अक्सर इतनी तेज होती है कि छोटी-सी बात पर भी नेताओं के ट्वीट, प्रेस नोट और बयान तुरंत सामने आ जाते हैं। लेकिन जब मामला किसी जघन्य अपराध का हो और उसमें जातीय समीकरण उलझ जाएं, तब अचानक सन्नाटा छा जाता है।

बिहार के सारण (छपरा) जिले से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने मानवता को झकझोर दिया है। बताया जा रहा है कि दसवीं कक्षा की एक छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म कर उसे घसीटते हुए कुएं में फेंक दिया गया, जहां तड़प-तड़प कर उसकी मौत हो गई। घटना जितनी भयावह है, उससे भी ज्यादा चौंकाने वाली है उस पर सियासी खामोशी।
देश की राजनीति में सक्रिय बड़े-बड़े नेताओं की सोशल मीडिया टाइमलाइन देखने वाले लोग पूछ रहे हैं—क्या इस घटना पर किसी बड़े नेता की प्रतिक्रिया आई?
क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया?
क्या कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कुछ कहा?
क्या लोकसभा सांसद चिराग पासवान ने आवाज उठाई?
क्या भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद (रावण) ने प्रतिक्रिया दी?
क्या बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बयान दिया?
क्या समाजवादी नेता अखिलेश यादव ने सवाल उठाया?
क्या बसपा सुप्रीमो मायावती ने विरोध दर्ज कराया?
या फिर राजद नेता तेजस्वी यादव ने कोई टिप्पणी की?
जनता का कहना है कि जवाब लगभग एक ही है—सन्नाटा।
व्यंग्य करने वाले कहते हैं कि शायद नेताओं के सलाहकार पहले यह तय करते होंगे कि अपराध में शामिल व्यक्ति किस जाति का है और पीड़ित किस समाज से है, उसके बाद ही तय होता होगा कि ट्वीट करना है या नहीं। अगर मामला वोट बैंक के गणित में फिट बैठता है तो बयान तुरंत आ जाता है, और अगर समीकरण बिगड़ने का खतरा हो तो चुप्पी ही सबसे सुरक्षित राजनीति बन जाती है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या इंसाफ की आवाज भी अब जातीय समीकरण देखकर ही उठेगी? क्या मानवता का दर्द भी वोट बैंक की एक्सेल शीट में फिट होने के बाद ही राजनीतिक बयान बन पाएगा?
सोशल मीडिया पर लोग तंज कसते हुए कह रहे हैं कि देश में शायद अब अपराध की भी दो श्रेणियां हो गई हैं—
एक, जिस पर तुरंत राजनीति होती है।
दूसरी, जिस पर राजनीति चुप रहना ही बेहतर समझती है।
फिलहाल, छपरा की यह घटना केवल एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि उस राजनीति पर भी बड़ा सवाल बनकर खड़ी है जो हर मुद्दे पर बोलती है, लेकिन कुछ मामलों में अचानक मौन साध लेती है।
