कटनी। देश में जैसे ही शांति और सामान्य स्थिति दिखाई देती है, वैसे ही सोशल मीडिया के कुछ “अफवाह विशेषज्ञ” अपने लैपटॉप और मोबाइल लेकर सक्रिय हो जाते हैं। इन दिनों फिर से एक नया अभियान चल पड़ा है, जिसमें बताया जा रहा है कि पेट्रोल खत्म हो गया है, गैस सिर्फ 8 दिन की बची है, होटल बंद हो रहे हैं और एम्बुलेंस को डीज़ल नहीं मिल रहा।
सूत्रों के मुताबिक, यह खबरें इतनी “पुख्ता” हैं कि इन्हें सबसे पहले व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों ने रिसर्च करके जारी किया है। रिसर्च का आधार वही पुरानी कोरोना काल की तस्वीरें और वीडियो हैं, जिन्हें हर संकट में नए पैकिंग के साथ फिर से बाजार में उतार दिया जाता है।
बताया जा रहा है कि अफवाह फैलाने की यह पूरी प्रक्रिया बहुत वैज्ञानिक तरीके से चलती है। पहले एक मैसेज वायरल किया जाता है – “भाई जल्दी पेट्रोल भरवा लो, कल से खत्म हो जाएगा।”
इसके बाद कुछ लोग डरकर पेट्रोल पंप पहुंचते हैं, लाइन लगती है, फिर वही लाइन का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया जाता है।
वीडियो के साथ कैप्शन होता है – “देख लो, हमने तो पहले ही कहा था… अब तो पंप पर भीड़ लग गई।”
इसके बाद अफवाहों का दूसरा चरण शुरू होता है –
गैस सिलेंडर खत्म होने वाला है, जल्दी बुक कर लो!
और देखते ही देखते लोग गैस एजेंसी के बाहर भी लाइन लगाने लगते हैं।
मजेदार बात यह है कि इन अफवाहों से सबसे ज्यादा फायदा दो लोगों को होता है –
पहला, सोशल मीडिया पर “फॉरवर्ड करने वाले योद्धाओं” को, जिन्हें लगता है कि देश की सुरक्षा अब उनके अंगूठे पर टिकी है।
और दूसरा, कुछ ऐसे लोग जो ब्लैक में सामान बेचने के मौके की तलाश में रहते हैं।
प्रशासन का कहना है कि पेट्रोल, डीज़ल और गैस की कोई कमी नहीं है, लेकिन अफवाहों का स्टॉक जरूर अनलिमिटेड है। इसलिए नागरिकों से अपील की गई है कि किसी भी खबर पर विश्वास करने से पहले आधिकारिक जानकारी जरूर देखें, क्योंकि आजकल फेक न्यूज की फैक्ट्री 24 घंटे ओवरटाइम कर रही है।
कुल मिलाकर हालात यह हैं कि देश में संसाधनों से ज्यादा तेजी से अगर कुछ बढ़ रहा है तो वह है – सोशल मीडिया की अफवाहें और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के शोधपत्र।
इसलिए शांत रहें, अफवाहों से दूर रहें और याद रखें –
कभी-कभी देश में पेट्रोल कम नहीं होता, सिर्फ अफवाहों का टैंक फुल हो जाता है।
अफवाह उद्योग फिर सक्रिय – पेट्रोल खत्म, गैस गायब और व्हाट्सएप विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अलर्ट!
