“मदद की गुहार लगाती बेटी, आश्वासन देती व्यवस्था – 5 साल से फाइल में फंसी एक मां की पुकार”बेटी हुई लव जिहाद का शिकार

पुरी।✍️ दर्पण 24 न्यूज विशेष रिपोर्ट 
कहते हैं मां की ममता पहाड़ भी हिला देती है, लेकिन हमारे सिस्टम की फाइलें इतनी भारी हैं कि उन्हें हिलाना शायद पहाड़ से भी कठिन है। पुरी के टाउन थाना क्षेत्र के बालिसाही सिद्धबकुल लेन की एक मां पिछले 5 वर्षों से अपनी बेटी को बांग्लादेश से वापस लाने की गुहार लगा रही है, मगर प्रशासन के पास अभी तक केवल एक ही “विशेष योजना” है — आश्वासन योजना।
मां की नाबालिग बेटी, जो कभी पढ़ाई में इतनी तेज थी कि 10वीं में 93% अंक लाकर परिवार का नाम रोशन किया था, आज बांग्लादेश में प्रताड़ना झेल रही है। बेटी कभी-कभी किसी का फोन लेकर अपनी मां को कॉल करती है और रोते हुए कहती है — “मां मुझे यहां से बचा लो।”
लेकिन दुख की बात यह है कि बेटी की पुकार से ज्यादा मजबूत शायद सरकारी फाइलों की नींद है।
ऑनलाइन पढ़ाई से शुरू हुई कहानी
कोविड काल में जब स्कूल बंद थे और बच्चे मोबाइल पर पढ़ाई कर रहे थे, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि ऑनलाइन क्लास के साथ-साथ ऑनलाइन जाल भी बिछ सकता है।
लड़की की पहचान एक ऐप के जरिए बांग्लादेश के एक युवक से हुई, चैटिंग शुरू हुई और धीरे-धीरे भरोसा भी।
27 नवंबर 2021 को लड़की पढ़ाई का बैग लेकर घर से निकली। परिवार को लगा कि वह ट्यूशन जा रही है, लेकिन असल में वह ऐसी “ट्यूशन” पर जा रही थी, जिसका सिलेबस शायद किसी को समझ नहीं आया।
पुलिस की जांच और उम्मीद की वापसी
मां ने तुरंत पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने फोन ट्रैक किया तो लोकेशन कूचबिहार में मिला। पुलिस और मां वहां तक पहुंची भी, मगर लड़की नहीं मिली।
शायद उस दिन किस्मत भी छुट्टी पर थी।
कुछ समय बाद बेटी का फोन आया और पता चला कि वह बांग्लादेश में है। उसने बताया कि वहां उसके साथ मानसिक और शारीरिक अत्याचार किया जा रहा है।
पांच साल, कई एसपी… लेकिन वही कहानी
इन पांच वर्षों में कई एसपी बदल गए, लेकिन फाइल शायद अपनी जगह से ज्यादा नहीं हिली।
मां का कहना है कि हर बार उन्हें यही सुनने को मिलता है — “देख रहे हैं… कार्रवाई होगी… चिंता मत कीजिए।”
यानी सिस्टम का फार्मूला साफ है —
समस्या पुरानी हो जाए, मगर आश्वासन हमेशा नया मिलता रहे।
मां ने खुद उठाया कदम
जब प्रशासन की गति घोंघे से भी धीमी लगी, तो मां ने खुद पासपोर्ट और वीज़ा बनवाया और बांग्लादेश जाकर बेटी को लाने की कोशिश की।
लेकिन वहां भी सहयोग की जगह शायद “प्रक्रिया” ही मिली।
फिर पहुंची एसपी कार्यालय
सोमवार को मां फिर एसपी कार्यालय पहुंची और अपनी बेटी को वापस लाने की अपील की।
इतना ही नहीं, आज उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सरकार से बेटी को बचाने की गुहार लगाई है।
सवाल सिस्टम से
अब सवाल यह है कि
एक मां की पुकार 5 साल से फाइलों में क्यों भटक रही है?
जब बेटी का लोकेशन तक पता है, तो कार्रवाई क्यों नहीं?
और अगर कोई समाधान नहीं है, तो क्या प्रशासन ने “इंतजार” को ही नीति बना लिया है?
क्योंकि यहां कहानी सिर्फ एक मां और बेटी की नहीं है,
बल्कि उस व्यवस्था की भी है जहां मदद की आवाज़ अक्सर फाइलों के ढेर में दब जाती है।

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