विशेष रिपोर्ट संवाददाता घनश्याम दास जी ✍️
जिस चीज़ को कभी लोग खेत में फेंक देते थे या रास्ते में देखकर नाक सिकोड़ लेते थे, वही आजकल गांवों में “बहुमूल्य संपत्ति” बनती जा रही है। जी हां, बात हो रही है गौ माता के गोबर और गोमूत्र की, जो अब कई लोगों के लिए आय का ऐसा साधन बन गया है कि शहर के लोग भी सोचने लगे हैं—“काश हमारे पास भी दो-चार गाय होतीं!”
गांवों में अब नई चर्चा यह नहीं होती कि किसके पास कितने बीघा खेत हैं, बल्कि यह कि किसके पास कितनी गायें हैं और रोज कितना गोबर निकल रहा है। क्योंकि गोबर अब सिर्फ गोबर नहीं रहा, बल्कि “ग्रीन गोल्ड” बन चुका है।
गोबर की कीमत सुनकर शहर वाले भी चौंक जाएंगे
गांवों में अब गोबर की कीमत किलो के हिसाब से तय होने लगी है। कई जगहों पर गोबर 2 से 5 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है। कुछ लोग इससे गोबर के कंडे, जैविक खाद और वर्मी कम्पोस्ट बनाकर और ज्यादा मुनाफा कमा रहे हैं।
कंडे बनाने वाली महिलाएं तो मजाक में कहती हैं—“पहले लोग हमें गोबर उठाते देखकर हंसते थे, अब पूछते हैं बहन जी, थोड़ा हमें भी दे दीजिए!”
गोमूत्र भी कम नहीं, इसकी भी ‘मार्केट वैल्यू’
अगर आपको लगता है कि सिर्फ गोबर ही बिकता है तो आप गलत हैं। गोमूत्र भी आजकल बोतल में भरकर बिक रहा है। आयुर्वेद और जैविक खेती के नाम पर इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
गांव के कुछ लोग तो सुबह-सुबह बाल्टी लेकर गाय के पीछे ऐसे खड़े रहते हैं जैसे कोई बड़ा उद्योगपति फैक्ट्री का कच्चा माल पकड़ने को तैयार हो।
सरकारी योजनाओं ने बढ़ाया गोबर का मान
कई राज्यों में गोबर खरीदने की योजनाएं भी चलाई जा रही हैं, जहां सरकार गोबर खरीदकर उससे जैविक खाद और बायोगैस बनाने का काम करती है। इससे किसानों को अतिरिक्त आय मिल रही है और गांव की अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो रही है।
व्यंग्य की नजर से देखें तो…
समय का पहिया भी बड़ा मजेदार है। कभी गांव का बच्चा गलती से गोबर में पैर रख देता था तो घर जाकर खूब डांट पड़ती थी। आज अगर वही बच्चा गलती से गोबर फेंक दे तो डांट पड़ती है—“अरे बेटा! पता है इसकी कीमत कितनी है?”
गांव के बुजुर्ग भी मुस्कुराकर कहते हैं—
“बेटा, पहले लोग कहते थे पढ़-लिख कर कुछ बनो, अब लगता है गाय पाल लो… क्योंकि गोबर और गोमूत्र की कमाई देखकर बड़े-बड़े बिजनेस भी शरमा जाएं।”
निष्कर्ष
सच तो यह है कि गाय से मिलने वाले गोबर और गोमूत्र का उपयोग जैविक खेती, खाद, बायोगैस और कई घरेलू उत्पादों में हो रहा है। इससे पर्यावरण को भी लाभ मिल रहा है और ग्रामीणों को रोजगार भी।
लेकिन गांव की भाषा में कहें तो—
“जिस चीज़ को कभी लोग बेकार समझते थे, वही आजकल गांव की ‘सबसे कीमती संपत्ति’ बन गई है।”
✍️ विशेष लेख
दर्पण 24 न्यूज
