दिनेश कुमार सम्पाकीय –दर्पण 24 न्यूज़ | विशेष रिपोर्ट
मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के संरक्षण के लिए बनाए गए Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 यानी एट्रोसिटी एक्ट के मामलों को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। हाल ही में सामने आए आंकड़ों के अनुसार राज्य में हर साल दर्ज होने वाले कई मामलों में बड़ी संख्या में शिकायतें जांच के दौरान झूठी या आधारहीन पाई जा रही हैं।
मिली जानकारी के अनुसार प्रदेश में हर वर्ष औसतन करीब 125 मामले दर्ज होते हैं, जिनमें से लगभग 70 प्रतिशत तक शिकायतें जांच के दौरान झूठी या निराधार साबित हो जाती हैं। वहीं पिछले वर्ष के आंकड़ों में भी करीब 59 प्रतिशत मामलों को जांच के बाद फर्जी पाया गया। इन आंकड़ों ने कानून के उपयोग और संभावित दुरुपयोग को लेकर चर्चा को तेज कर दिया है।
कानून का उद्देश्य और मौजूदा स्थिति
एट्रोसिटी एक्ट का मुख्य उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को सुरक्षा, सम्मान और न्याय दिलाना है। यह कानून उन मामलों में सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करता है, जहां अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के साथ भेदभाव, हिंसा या उत्पीड़न होता है।
लेकिन जब बड़ी संख्या में शिकायतें जांच के दौरान झूठी पाई जाती हैं, तो यह स्थिति कई तरह के सवाल खड़े करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल न्यायिक व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बढ़ता है, बल्कि वास्तविक पीड़ितों की शिकायतों को भी संदेह की नजर से देखा जाने लगता है।
क्या व्यक्तिगत विवाद बन रहे हैं कारण?
कई मामलों में यह भी सामने आया है कि कुछ लोग व्यक्तिगत विवाद, आपसी रंजिश या दबाव बनाने के उद्देश्य से भी इस कानून का सहारा लेते हैं। हालांकि सभी मामलों को एक ही नजर से देखना उचित नहीं है, क्योंकि समाज में ऐसे कई मामले भी हैं जहां वास्तव में अत्याचार होता है और पीड़ितों को इसी कानून के माध्यम से न्याय मिलता है।
फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कानून का दुरुपयोग बढ़ता है, तो इससे कानून की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ सकता है।
असली पीड़ितों पर पड़ता है असर
कानून के जानकारों का कहना है कि जब बड़ी संख्या में शिकायतें झूठी साबित होती हैं, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान सच्चे पीड़ितों को होता है। क्योंकि हर फर्जी मामले के बाद जांच एजेंसियों और समाज में संदेह की स्थिति पैदा हो जाती है। इससे कई बार वास्तविक पीड़ितों को न्याय पाने में अधिक कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।
जांच प्रक्रिया को मजबूत करने की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए जांच प्रक्रिया को और अधिक मजबूत और पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है। यदि शिकायतों की जांच निष्पक्ष और तेजी से की जाए तो जहां एक ओर वास्तविक पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सकेगा, वहीं झूठे आरोप लगाने वालों पर भी कड़ी कार्रवाई संभव होगी।
सरकार और प्रशासन के लिए संकेत
यह स्थिति सरकार और प्रशासन के लिए भी एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है। जरूरत इस बात की है कि कानून का सही और संतुलित उपयोग सुनिश्चित किया जाए। साथ ही लोगों को यह भी जागरूक किया जाए कि किसी भी कानून का दुरुपयोग अंततः न्याय व्यवस्था को कमजोर करता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस दिशा में प्रभावी कदम उठाए जाते हैं तो न केवल एट्रोसिटी एक्ट का उद्देश्य और अधिक मजबूत होगा, बल्कि समाज में न्याय और विश्वास की भावना भी बढ़ेगी।
