17 साल बाद खुला “ईमानदारी का खजाना”, फर्जी एफडीआर से टोल नाका तक का सफर!

उमरिया।मध्य प्रदेश के उमरिया जिले के मानपुर स्थित सोन नदी के मसीरा घाट टोल नाका ठेका मामले में 17 साल बाद ऐसा मोड़ आया है कि ईमानदारी भी शायद शर्म से सिर झुका ले। कोतवाली पुलिस ने बाहुबली आरोपी अमित खम्परिया के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया है। आरोप है कि टोल नाका का ठेका हासिल करने के लिए ऐसी एफडीआर लगाई गई थी, जो कागजों में तो करोड़ों की थी, लेकिन असलियत में शायद स्याही और कागज से ज्यादा की नहीं थी।

जानकारी के मुताबिक, उस समय टोल नाका का ठेका लेने के लिए बैंक से जुड़ी एफडीआर लगाना जरूरी था। लेकिन जहां आम आदमी असली एफडीआर बनवाने के लिए बैंक की लाइन में पसीना बहाता है, वहीं कुछ प्रतिभाशाली लोग “रचनात्मक दिमाग” लगाकर कागज पर ही एफडीआर तैयार कर लेते हैं और सीधे ठेका भी हासिल कर लेते हैं। अब इसे जुगाड़ कहें या “उद्यमिता”, यह तो जांच पूरी होने के बाद ही तय होगा।

बताया जा रहा है कि आरोपी अमित खम्परिया के खिलाफ पहले से ही मध्यप्रदेश के कई जिलों में गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। यानी अनुभव की कमी का सवाल ही नहीं उठता। ऐसे अनुभवी लोगों के सामने नियम-कानून भी शायद कई बार कन्फ्यूज हो जाते हैं कि आखिर इन्हें रोका कैसे जाए।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह मामला करीब 17 साल पुराना है। यानी न्याय व्यवस्था भी शायद इस फाइल को खोलने के लिए सही “मुहूर्त” का इंतजार कर रही थी। अब जब मामला खुला है, तो पुलिस दस्तावेजों की बारीकी से जांच कर रही है और उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में इस “रचनात्मक वित्तीय इंजीनियरिंग” के और भी दिलचस्प राज सामने आ सकते हैं।

फिलहाल कोतवाली पुलिस जांच में जुटी है और जनता यह सोच रही है कि अगर कागज की एफडीआर से टोल नाका का ठेका मिल सकता है, तो शायद देश में प्रतिभा की कमी नहीं है—बस दिशा थोड़ी गलत हो जाती है।

दर्पण 24 न्यूज़ की नजर इस पूरे मामले पर बनी हुई है, क्योंकि यहां कहानी सिर्फ एक फर्जी एफडीआर की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की भी है जहां कागज के खेल में कभी-कभी सच्चाई भी हार जाती है।

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