सम्पादकीय– दिनेश कुमार
“खाकी खड़ी है, खादी बैठी है।
शिक्षा खड़ी है, अशिक्षा बैठी है।”
तस्वीर में दृश्य कुछ यूँ है—एक महिला पुलिस अधिकारी (खाकी वर्दी में) खड़ी हैं, जबकि सोफे पर सफेद कुर्ता-पायजामा और जैकेट पहने कुछ जनप्रतिनिधि आराम से बैठे हुए हैं। सामने मेज़, फूलों की सजावट और गंभीर चर्चा का माहौल… लेकिन पोस्टर का संदेश चर्चा से कहीं ज़्यादा गहरा है।
दृश्य का विश्लेषण
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खाकी खड़ी है – यानी व्यवस्था का अनुशासन, कानून और सुरक्षा अब भी अपने पैरों पर खड़ा है, चौकन्ना है।
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खादी बैठी है – यानी राजनीति आराम की मुद्रा में है, निर्णय लेने की कुर्सी पर विराजमान है।
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शिक्षा खड़ी है – पढ़ा-लिखा वर्ग, योग्य लोग, अधिकारी… अक्सर खड़े ही रह जाते हैं।
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अशिक्षा बैठी है – कुर्सी पर अधिकार कभी-कभी योग्यता से ज़्यादा समीकरणों के सहारे मिल जाता है।
यह व्यंग्य किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि उस मानसिकता पर है जहाँ पद और प्रतिष्ठा की प्राथमिकता योग्यता से ऊपर हो जाती है।
सवाल कुर्सी का नहीं, सोच का है
कई लोग कहेंगे—“बैठक में कोई खड़ा है तो यह सामान्य शिष्टाचार हो सकता है।” बिल्कुल हो सकता है।
लेकिन जब यही दृश्य एक संदेश के साथ वायरल होता है, तो वह केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि समाज के भीतर की हलचल को उजागर करता है।
आज भी कई दफ्तरों और बैठकों में देखा जाता है कि
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निर्णय लेने वाले बैठते हैं,
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काम करने वाले खड़े रहते हैं।
व्यंग्य यहीं चुभता है—क्या व्यवस्था में सम्मान पद से तय होगा या कर्म से?
शिक्षा बनाम अशिक्षा – असली बहस
“शिक्षा खड़ी है, अशिक्षा बैठी है।”
यह पंक्ति सीधे उस विडंबना पर चोट करती है जहाँ
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पढ़ा-लिखा युवा नौकरी की कतार में खड़ा है,
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और सत्ता की कुर्सी पर कभी-कभी शिक्षा से अधिक जाति, समीकरण या संसाधन बैठ जाते हैं।
यह लोकतंत्र पर प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जागरूकता पर सवाल है।
सोशल मीडिया की अदालत
आज का दौर डिजिटल है। एक तस्वीर हजार शब्दों से ज्यादा बोलती है।
यह पोस्टर भी वैसा ही है—बिना नाम लिए, बिना आरोप लगाए, व्यवस्था की तस्वीर खींच देता है।
लोग कमेंट में लिख रहे हैं—
“देश बदल रहा है, दृश्य वही है।”
“योग्यता खड़ी है, राजनीति बैठी है।”
निष्कर्ष: व्यंग्य आईना है
व्यंग्य का काम आरोप लगाना नहीं, आईना दिखाना है।
यह पोस्टर हमें सोचने पर मजबूर करता है—
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क्या हम सच में योग्यता का सम्मान कर रहे हैं?
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क्या पद पर बैठने का मापदंड केवल राजनीति है या प्रतिभा भी?
जब तक “शिक्षा” को बैठने की जगह नहीं मिलेगी, “अशिक्षा” का आराम खत्म नहीं होगा।
