कटनी जिले की ग्राम पंचायत झलवारा इन दिनों किसी विकास कार्य से नहीं, बल्कि “बिना सील–बिना हस्ताक्षर” भुगतान मॉडल से सुर्खियों में है। यहां कथित तौर पर ऐसे-ऐसे भुगतान हो रहे हैं जिनमें न सरपंच की सील दिख रही है, न सचिव के विधिवत हस्ताक्षर — लेकिन रकम पूरी शान से निकल रही है। ग्रामीण अब इसे प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि “डिजिटल युग का नया आविष्कार” बता रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार पंचायत सचिव द्वारा पोर्टल पर लगाए जा रहे बिलों में न तो सरपंच की स्पष्ट स्वीकृति नजर आ रही है और न ही अनिवार्य दस्तावेज। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या झलवारा में अब सील और हस्ताक्षर की जरूरत खत्म हो चुकी है? क्या नई तकनीक में “सोचिए और भुगतान पाइए” सुविधा शुरू हो गई है?
ग्रामीणों का कहना है कि यदि आरोपों में सच्चाई है तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि पारदर्शिता के नाम पर पर्दा डालने जैसा है। पंचायत स्तर पर जहां हर रुपए का हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए, वहां प्रक्रिया ही “मौन व्रत” पर है।
अब सबकी निगाहें जनपद पंचायत कटनी के मुख्य कार्यपालन अधिकारी प्रदीप सिंह पर टिकी हैं। ग्रामीणों की मांग है कि वे इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच कराएं, रिकॉर्ड खंगालें और यदि गड़बड़ी पाई जाती है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई सुनिश्चित करें। आखिर नियम किताबों में रखने के लिए नहीं, पालन के लिए बनाए जाते हैं।
झलवारा पंचायत का यह मामला यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि यदि पंचायत स्तर पर ही नियमों को “वैकल्पिक” समझ लिया जाएगा, तो ग्रामीण विकास योजनाओं की साख कैसे बचेगी?
अब देखना यह है कि प्रशासन इस “बिना सील–हस्ताक्षर भुगतान प्रयोग” को नवाचार मानेगा या अनियमितता। फिलहाल गांव में चर्चा यही है — “काम हो या न हो, भुगतान जरूर हो!”
