मजहब नहीं सिखाता… लेकिन इंसान कब सीखेगा?”

दर्पण 24 न्यूज | विशेष रिपोर्ट

देश में इन दिनों एक पुरानी लाइन फिर से चर्चा में है — “मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।”

लाइन पुरानी है, बहस नई है, और गुस्सा सदाबहार।

इतिहास के पन्ने खोलिए तो वहां राजाओं की तलवारें दिखती हैं, साम्राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा दिखती है, सत्ता की भूख दिखती है। लेकिन हर दौर में एक सुविधा भी दिखती है — जब भी लड़ाई हुई, उसका ठीकरा “मजहब” के सिर फोड़ दिया गया।

सवाल यह है कि क्या सचमुच मजहब लड़ता है?

या फिर सत्ता, जमीन, सोना और सिंहासन की भूख लड़ती है?

इतिहास गवाह है कि आक्रमणकारियों ने मंदिर भी तोड़े, मस्जिद भी तोड़ीं, चर्च भी जले, सभ्यताएं भी उजड़ीं। लेकिन तलवार किसी धर्मग्रंथ ने नहीं चलाई — तलवार इंसान ने चलाई।

आज भी राजनीति का मौसम बदलते ही “धर्म खतरे में है” का अलार्म बजने लगता है। चुनाव आते हैं तो श्रद्धा का तापमान अचानक 45 डिग्री पहुंच जाता है। सोशल मीडिया की प्रयोगशाला में इतिहास को उबालकर परोसा जाता है, और फिर जनता को बताया जाता है — “देखिए, आपके साथ क्या हुआ था!”

मगर कोई यह नहीं बताता कि

– महंगाई किस मजहब की है?

– बेरोजगारी किस धर्म की है?

– भ्रष्टाचार किस पूजा पद्धति का है?

जब रोटी महंगी होती है तो वह हिंदू या मुसलमान नहीं होती।

जब नौकरी नहीं मिलती तो वह जाति नहीं पूछती।

कट्टरता हर धर्म में समस्या है — और इंसानियत हर धर्म में समाधान।

लेकिन समाधान बेचने में वोट नहीं मिलते, डर बेचने में मिलते हैं।

इतिहास की गलतियों को याद रखना जरूरी है,

पर भविष्य की बर्बादी का आधार बनाना खतरनाक।

व्यंग्य यही है कि

मजहब शायद सच में बैर नहीं सिखाता,

लेकिन इंसान अक्सर उसे बैर सिखा देता है।

दर्पण 24 न्यूज की यह विशेष रिपोर्ट किसी धर्म पर नहीं, बल्कि कट्टरता, राजनीति और नफरत के कारोबार पर व्यंग्य है।

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