मेट्रो शहरों से एक दिलचस्प सामाजिक रिपोर्ट सामने आई है — पिछले तीन साल में तलाक के मामलों में तीन गुना बढ़ोतरी। खास बात यह कि लगभग 58% मामलों में पहल महिलाओं की ओर से हो रही है। यानी अब “सब चलता है” वाला दौर धीरे-धीरे “बस अब नहीं चलेगा” में बदलता दिख रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता ने रिश्तों की परिभाषा बदल दी है। पहले शादी एक लाइफटाइम सब्सक्रिप्शन मानी जाती थी — चाहे सर्विस अच्छी हो या खराब, कैंसिल करने का ऑप्शन नहीं था। अब लोग इसे ऐप की तरह देखने लगे हैं — संतुष्टि नहीं मिली तो अनइंस्टॉल।
व्यंग्य यही है कि समाज अभी भी चौंक रहा है — “इतने तलाक क्यों हो रहे हैं?”
जवाब सीधा है — पहले भी समस्याएं थीं, बस बाहर निकलने का रास्ता नहीं था। अब रास्ता है, इसलिए फैसले दिख रहे हैं।
कुछ लोग इसे “परिवार व्यवस्था पर संकट” बता रहे हैं, तो कुछ इसे “व्यक्तिगत सम्मान की जीत” कह रहे हैं। सच शायद बीच में कहीं खड़ा मुस्कुरा रहा है — क्योंकि शादी अब सिर्फ सामाजिक दबाव नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों की साझेदारी मानी जा रही है।
हालांकि, इस ट्रेंड ने एक नई चिंता भी पैदा कर दी है — रिश्तों में धैर्य कम हो रहा है या आत्मसम्मान बढ़ रहा है?
क्योंकि जहां पहले लोग समझौते में उम्र निकाल देते थे, वहीं अब लोग असंतोष में समय बर्बाद करने को तैयार नहीं।
फिलहाल निष्कर्ष यही है —
शादी अब भी हो रही है, लेकिन “किसी भी कीमत पर निभानी है” वाला नियम अपडेट होकर “खुश रहना है तो निभानी है” बन चुका है।
— दर्पण 24 न्यूज
