मध्यप्रदेश के खरगोन जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने यह साबित कर दिया है कि हमारे यहां न्याय की गाड़ी भले ही बैलगाड़ी की रफ्तार से चले, लेकिन चलती जरूर है — और कभी-कभी 45 साल बाद भी पहुंच जाती है।
कहानी एक ऐसे “महान अपराधी” की है जिसने करीब 45 साल पहले, महज 20 साल की उम्र में 100 रुपये का गेहूं चुरा लिया था। उस समय शायद उसे अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि यह गेहूं सिर्फ आटा नहीं बनेगा, बल्कि उसकी जिंदगी की फाइल बनकर सरकारी अलमारी में सुरक्षित रखा जाएगा — धूल के नीचे, लेकिन जिंदा!
अब जब वह शख्स 65 साल का हो चुका है, बाल सफेद हो चुके हैं, और शायद दांत भी सरकारी व्यवस्था से पहले गिर चुके हैं — तभी कानून ने दरवाजा खटखटाया और कहा, “बेटा, हिसाब बाकी है!”
कानून की लंबी सांस
यह मामला बताता है कि हमारे यहां न्यायपालिका और प्रशासन की याददाश्त गज़ब की है। 100 रुपये का गेहूं भले ही बाजार में 45 साल में 1000 रुपये का हो गया हो, लेकिन फाइल की कीमत वही 100 रुपये वाली रही — जिसे सिस्टम ने संभाल कर रखा।
जहां बड़े-बड़े घोटालों की फाइलें “ट्रेस आउट ऑफ रिकॉर्ड” हो जाती हैं, वहीं 100 रुपये का गेहूं सिस्टम की प्राथमिकता सूची में टॉप पर बना रहा। आखिर न्याय सबके लिए समान है — चाहे गेहूं हो या घोटाला!
सवाल भी जरूरी है
व्यंग्य अपनी जगह, लेकिन यह घटना कई सवाल भी खड़े करती है —
क्या 45 साल बाद ऐसी सजा न्याय है या सिर्फ प्रक्रिया की औपचारिकता?
क्या इतनी देरी से दिया गया फैसला समाज को सुधारता है या व्यवस्था की सुस्ती को उजागर करता है?
निष्कर्ष
कानून ने एक बार फिर साबित किया है कि “देर है, अंधेर नहीं” — बस कभी-कभी इतनी देर हो जाती है कि आरोपी जवान से बुजुर्ग हो जाता है और 100 रुपये का गेहूं इतिहास बन जाता है।
खरगोन की यह कहानी हमें हंसाती भी है और सोचने पर मजबूर भी करती है — कि न्याय की घड़ी चल तो रही है, लेकिन उसकी सुइयां शायद 1970 के दशक में ही अटक गई थीं।
— दर्पण 24 न्यूज़ डेस्क
