
चित्रकूट | दर्पण 24 न्यूज़ सह संपादक ✍️उमेश त्रिपाठी
उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले से सामने आई एक प्रेरणादायक खबर ने देशभर में सकारात्मक चर्चा को जन्म दिया है। जिले के कलेक्टर ने अपनी बेटी को किसी महंगे निजी स्कूल में दाखिला दिलाने के बजाय एक सामान्य आंगनवाड़ी केंद्र में पढ़ाने का निर्णय लिया है। यह कदम न केवल व्यक्तिगत सोच का परिचायक है, बल्कि सामाजिक समानता और संवेदनशीलता का भी सशक्त संदेश देता है।
आज के दौर में जहां शिक्षा दिखावे, प्रतिस्पर्धा और व्यवसाय का रूप लेती जा रही है, वहीं एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी द्वारा सादगी और बराबरी का रास्ता चुनना व्यवस्था को आईना दिखाता है। यह निर्णय बताता है कि सच्ची शिक्षा केवल संसाधनों और सुविधाओं पर नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों और अनुभवों पर आधारित होती है।
महंगे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का बचपन अक्सर सुविधाओं के दबाव में गुजरता है, जबकि आंगनवाड़ी जैसे केंद्र बच्चों को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से जोड़ते हैं। यहां बच्चे अभाव, संघर्ष और सहनशीलता को करीब से समझते हैं, जो उन्हें आगे चलकर संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनाता है।
कलेक्टर की बिटिया का बचपन उन बच्चों के बीच बीतेगा, जो सीमित संसाधनों में भी मुस्कुराना जानते हैं। वह भूख, मेहनत और साझा जीवन के महत्व को समझेगी। यही अनुभव उसके भीतर मानवीय मूल्यों की मजबूत नींव रखेंगे।
यह पहल प्रदेश और देश के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि शिक्षा की गुणवत्ता केवल भवन, फीस या ब्रांड से नहीं, बल्कि संस्कार और जीवन के अनुभवों से तय होती है। प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे इस उदाहरण को प्रेरणास्रोत के रूप में प्रस्तुत करें, ताकि अन्य अभिभावक भी इससे सीख लें।
समाज के तथाकथित अग्र वर्ग के लिए यह आत्ममंथन का विषय है कि समानता और संवेदना के ऐसे उदाहरण अब तक क्यों कम देखने को मिलते रहे हैं। यह छोटी-सी पहल आने वाले समय में बड़े सामाजिक परिवर्तन की आधारशिला बन सकती है।
आज आंगनवाड़ी में बैठी यह बिटिया, कल एक बेहतर और संवेदनशील भारत की प्रतीक बन सकती है।
